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अधिदेश, परिप्रेक्ष्य,संगठनात्मक ढांचा
विश्व की तिलहन-फसलों में मूँगफली का एक महत्वपूर्ण स्थान है। भारतीय क़ृषि अनुसंधान परिषद ने, वर्ष 1979 में, इस फसल पर अनुसंधान करने के लिए जूनागढ़ जिले में गिरनार पर्वत की तलहटी के समीप 'राष्ट्रीय मूँगफली अनुसंधान केन्द्र' की जूनागढ़-वेरावल राजमार्ग पर की। इस केन्द्र ने अपनी शुरूआत एक छोटी सी इमारत में मात्र 18 हेक्टेयर क़ृषि भूमि के साथ की।

            तत्पश्चात, वर्ष 1991 में, इस केन्द्र को सम्पूर्ण रूप से अपने मूल स्थान से जूनागढ़-ईवनगर रोड पर स्थानांतरित कर दिया गया। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना की अवधि में, राष्ट्रीय मूँगफली अनुसंधान केन्द्र को क्रमोन्नत कर Directorate of Groundnut Research or DGR ('मूंगफली अनुसंधान निदेशालय') कर दिया गया।
अधिदेश

  • मूँगफली की उत्पादकता, गुणवत्ता तथा उत्पादन बढ़ाने के लिए मौलिक और सामरिक  अनुसंधान करना

  • मूँगफली जननद्रव्य और मूँगफली अनुसंधान सम्बंधित सूचनाओं को राष्ट्रीय भंडार के रूप में संग्रहित करना

  •  संबंधित संस्थागत संपर्क स्थापित करना

  • परामर्श और प्रशिक्षण उपलब्ध कराना

  • अखिल भारतीय मूँगफली समन्ववित और अनुसंधान परियोजना के माध्यम से स्थान विशेष प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए आर्थिक सहायता देना और समन्वय तंत्र प्रदान करना।

 परिप्रेक्ष्य

डीजीआर का परिप्रेक्ष्य कथन है-" मूँगफली-आधारित उत्पादन प्रणाली की दक्षता को उपयुक्त फसल-प्रणाली, मूल्य-संवर्धन एवं उत्पाद विविधता के द्वारा एक स्थायी आधार पर बढ़ाना, जिससे मूंगफली-प्रणाली एक टिकाऊ, लाभकारी एवं विxव स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनी रहे।"

 

संगठनात्मक ढांचा

निदेशक, डीजीआर का मुख्य कार्यकारी अधिकारी होता है। प्रशासनिक सुविधा हेतु वैज्ञानिकों को निम्नलिखित पांच इकाइयों में बांटा गया हैं।  फसल सुधार, फसल उत्पादन, फसल सुरक्षा, मौलिक विज्ञान तथा सामाजिक विज्ञान।

       तकनीकी श्रेणी के अधिकारी अनुसंधान प्रयोगों में सहायता प्रदान करते हैं, जबकि प्रशासन, लेखा, भंडार, फार्म तथा सूचना एवं प्रलेखन कक्ष तथा अन्य अवश्यकताओं के लिए शासकीय अधिकारी सेवाएं प्रदान करते हैं।

            डीजीआर के पास एक विकसित आधारभूत ढांचा है, जिसमें 105 हेक्टेयर का फार्म प्रक्षेत्र, एक मुख्य प्रयोगशाला-सह-कार्यालय भवन जिसमें विविध प्रयोगशालाओं के साथ एक सम्मेलन भवन, एक सभागार तथा एक सूचना एवं प्रलेखन कोष्ठ समाहित है। अन्य सहायक निर्माण संरचनाओ में एक ग्लास हाउस, तीन जाली भवन, दो एनेक्सी प्रयोगशालाएं, एक प्रक्षेत्र प्रबंधक कार्यालय-एवं-ट्रेक्टर शेड, एक केंटीन, एक मनोरंजन क्लब, एक बीज भंडार, एक प्रशितीत भंडार, तीन प्रक्षेत्र-भंडार एवं एक जनरेटर कक्ष, इत्यादि हैं।

       प्रक्षेत्र में वर्षा का पानी आसपास के क्षेत्रो से बह कर एक मौसमी नदी के माध्यम से डीजीआर के एक जलाशय में आता है। लगभग दो हैक्टेयर में फैला यह जलाशय पक्षियों को आश्रय प्रदान करने के अलावा भूजल के पुर्नभरण में मदद करता है।
      आंगतुकों के आराम से रहने के लिए एक अतिथि-गृह है तथा प्रशिक्षार्थिओं के लिए एक प्रशिक्षार्थी-आवास है। डीजीआर में कार्यरत कर्मचारियों के लिए एक आवासीय परिसर है, जिसमें विभिन्न प्रकार के 43 आवासीय भवन हैं।इस निदेशालय को कुल 140 नियमित स्वीकृत पद हैं, जिनमें एक निदेशक पद के अलावा 39 वैज्ञानिक पद, 40 तकनिकी पद, 15 प्रशासनिक पद तथा 26 सहायक कर्मचारी पद शामिल हैं।
      कुल वैज्ञानिक पदों में से, पादप प्रजनन में 9, पादप रोग विज्ञान में 5, कीटविज्ञान, सस्य विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी और पादप शरीर विज्ञान में प्रत्येक में 3, जैव रसायन, आनुवांशिकी, सूक्ष्म जीव विज्ञान और मृदा विज्ञान में प्रत्येक में 2 तथा सूत्रकृमि विज्ञान, क़ृषि अर्थशास्त्र, कृषि विस्तार, कृषि सांख्यिकी और बीज तकनीकी में प्रत्येक में एक पद हैं।
      विभिन्न फसल-चरणों के दौरान मूँगफली की फसल को कई विपरीत स्थितियों से गुजरना पडता है। महत्वपूर्ण अजैव कारकों में सूखा, लवणता, कम या ज्यादा तापमान, पोषक तत्वों की कमी और जैव कारकों में विविध रोग, कीट और खरपतवार महत्वपूर्ण हैं।  

     अतः डीजीआर की अनुसंधान की गतिविधियों का लक्ष्य एसी प्रौद्योगिकियों का विकास करना है जो इन प्रतिकूल कारकों के प्रभाव घटायें और इस प्रकार विभिन्न कृषि पारिस्थितिकियों में उच्चतम पैदावार सुनिश्चत कर सकें।

     डीजीआर की अनुसंधान गतिविधियों को तीन मुख्य क्षेत्रों में विभाजित किया गया है- फसल सुधार, फसल उत्पादन, एवं फसल सुरक्षा।
 

फसल सुधार,   फसल उत्पादन,   फसल सुरक्षा
फसल सुधार

डीजीआर, मूँगफली-जननद्रव्य के राष्ट्रीय-भंडार के रूप में कार्य करता है। जर्मप्लाज्म प्रविष्टियों की अकारिकी-शारीरिकी और सस्य वैज्ञानिक लक्षणों को चिन्हित कर सूचीबद्ध किया गया है। विभिन्न कृषि-पारिस्थितिकीय स्थितियों में नई किस्मों के विकास के लिए प्रजनक सामग्री के रूप में जर्मप्लाज्म-संग्रहण उपयोगी होता है।
हालांकि मूँगफली की वनीय-किस्मों में कई उपयोगी वंशाणु होते हैं, परंतु यह घरेलू किस्मों के साथ संकरण के लिए सुसंगत नहीं होती है। इसलिए वैज्ञानिक ऐसी वैकल्पिक तकनीकों का विकास कर रहे हैं जिससे इन उपयोगी वंशाणुओं को खेती-योग्य किस्मों में स्थापित कर सकें।
पादप प्रजनन के पारंपरिक तरीकों के अलावा, मार्कर-सहायता से प्रजनन और ट्रांसजेनिक तकनीक द्वारा भी उन्नत किस्मों के विकास के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
उपज का बाजार-मूल्य निर्धारण करने में नई किस्मों की गुणवत्ता महत्वपूर्ण होती है। इन नई किस्मों में तैल, प्रोटीन तथा गुणवत्ता के अन्य घटकों का नियमित मूल्यांकन किया जा रहा है।

फसल उत्पादन
मूंगफली की किस्म कितनी भी अच्छी हो, लेकिन एक अच्छी फसल उत्पादन प्रक्रिया अपनाए बिना उसकी उपज-क्षमता प्राप्त नहीं की जा सकती। सस्य क्रियाएँ, जैसे उपयुक्त समय पर बुवाई, उर्वरकों की मात्रा, समय और स्थिति अनुसार पर अंतर्सस्य क्रियाएँ और सिंचाई, किसानों को अधिक उपज दिला कर अधिक वार्षिक प्रतिफल सुनिश्चित करने में सहायक होती है। उच्च उत्पादकता को बनाए रखने के लिए सूक्ष्म पोषक तत्वों की आवश्यकता एवं अनुप्रयोग विधि पर भी काम चल रहा है। उपलब्ध सिंचाई-जल का उपयुक्त प्रबंधन करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

देसी किस्मों की तुलना में अधिक नाइट्रोजन स्थिरिकरण करने वाली राइजोबियम की बेहतर किस्मों का विकास किया जा रहा है। इसके अलावा, अन्य लाभकारी सूक्ष्मजीवों के साथ राइजोबियम के ऐसे समूहों का विकास किया जा रहा है जो उपज को और अधिक बढ़ाने में सक्षम हों।

मूँगफली किसान अपनी भूमि और अन्य संसाधनो के भरपूर उपयोग करने के लिए, मूँगफली के साथ या मूँगफली के बाद कौनसी अन्य फसल किस प्रकार लगाए, यह उत्पादन प्रणाली के विकास अनुसंधान का केन्द्र बिन्दु है।

फसल सुरक्षा
यदि फसल की अच्छी किस्मों को पोषक तत्वों से परिपूर्ण भूमि एवं अनुकूल जलवायु में उगाया जाये फिर भी यह सुनिश्चित नहीं किया जा सकता कि उपज अच्छी ही होगी क्योंकि फसल पर अनेक जैविक कारकों का दबाव रहता है। मृदा-जनित, पर्णीय फफूंद रोगों और वायरस के दुष्प्रभाव से उपज को भारी नुकसान पहुँचता है। चूसने और निष्पत्रण करने वाले कीट भी फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। कुछ कीट तो फसल-उत्पादन उपरांत भंडारण के दौरान भी अच्छी फलियों को खराब कर देते हैं। सभी प्रमुख जैविक दबावों को निष्प्रभावी करने हेतु वैज्ञानिक पर्यावरण-अनुकूल और कम लागतवाले नियंत्रण-उपायों को विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं।
खरीफ ऋतु में प्रकृति भी प्रायः अल्प या अनियमित वर्षा के रूप में फसल पर आघात करती है। फसल-चक्र के महत्वपूर्ण चरणों में यदि फसल सूखे की लंबी अवधि से ग्रस्त हो जाये तो उत्पादकता कम हो जाती है और यदा कदा फसल पूरी तरह से भी निष्फल हो सकती है। सूखे को सहन करने के लिए अकारिकी-कार्यिकी लक्षणों का अध्ययन किया जा रहा है ताकि इस आधार पर प्रजनन-प्रक्रिया में सहिष्णुता वाली संततिओं की पहचान की जा सकें।
यंत्रीकरण
यंत्रीकरण, कृषि-संचालन में होने वाले कठिन परिश्रम को केवल कम ही नहीं करता है बल्कि किसान को सभी महत्वपूर्ण कार्य जैसे खेत की तैयारी, बुवाई और कटाई उचित समय में पूरा करने में मदद करता है। यह ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि-श्रमिकों की बढ़ती कमी से भी किसानों को राहत दिलाता है।

ट्रैक्टर और बैलों द्वारा चलने वाले अनेक उपकरण बाजार में उपलब्ध हैं, जैसे डिकोर्टीकेटर, सीड ड्रिल, हारवेस्टर, थ्रेशर, इत्यादि। इन उपकरणों की क्षमता का अध्ययन किया जा रहा है ताकि आवश्यकतानुसार सुधार किया जा सके।

उत्पादन उपरांत उपयोग एवं मूल्य संवर्धन

सूक्ष्मजैविक प्रक्रिया द्वारा मूँगफली के बाहरी छिलके और तैल निष्कासन पxचात प्राप्त खली से, औद्योगिक उपयोग के किण्वक और रसायन प्राप्त किए जा सकते हैं। प्रमुख तिलहनों में मूँगफली विशिष्ट है, क्योंकि इसको सीधे ही भून कर खाद्य पदार्थ के रूप में उपभोग किया जा सकता है। इससे कई अन्य खाद्य उत्पाद भी बनाए जा सकते हैं और इसका यह पहलू मूल्य-संवर्धन की दिशा में अनुसंधान के लिए महत्वपूर्ण है।
विस्तार एवं आर्थिकी क्षेत्र के वैज्ञानिक, जो भी प्रौद्योगिकीयाँ विकसित होती है, उनकी लाभप्रदता तथा किसानों द्वारा उन्हें अपनाए जाने में आने वाली  कठिनाईयों का अध्ययन करते है।


वैज्ञानिकों द्वारा, मूँगफली-उत्पादन की नवीनतम प्रणाली से राज्यों के प्रसार कार्यकर्ताओं तथा किसानों को अवगत करने हेतु, विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है। विभिन्न सांख्यिकीय तकनीकों के व्यापक ज्ञान रखनेवाले सांख्यिकीविद, प्रयोगों की रूपरेखा बनाने में तथा उनसे प्राप्त जटिल आंकड़ो का विश्लेषण करने में सहायता प्रदान करते है।
उपलब्धियां

  • जननद्रव्य की 8983 प्रविष्टियां संग्रहित की गई हैं।

  • मूँगफली की वनीय-प्रजातियों में उपलब्ध पिछेता पत्री धब्बा, रस्ट, तना-सड़न, PBND आल्टरनेरिया ब्लाइट के लिए प्रतिरोधी वंशाणुओं को खेती योग्य मूँगफली किस्मों में प्रतिस्थापित किया गया है।

  • विभिन्न रोगों के लिए प्रतिरोधी 9 जननद्रव्य प्रविष्टियों को पंजीकृत करा लिया गया है।

  • डीजीआर से सीधे तौर पर मूँगफली की तीन किस्मों का विकास हुआ है। 1988 में एक स्पेनिश झुमका किस्म 'गिरनार 1', 2008 में वर्जिनिया बन्च किस्म 'गिरनार 2' और 2010 में स्पेनिश झुमका किस्म 'गिरनार 3'।

  • राज्यों के कृषि विxवविद्यालयों ने, डीजीआर में विकसित प्रजनन सामग्री के उपयोग से, चार किस्में जैसे 1988 में 'HNG10' 1999 में 'GG 5', 2001 में 'GG7', 2002 में 'AK 159' विकसित किया है। 

  • जेनेटिक इंजीनियरिंग के द्वारा कवक-प्रतिरोध के लिए डिफेंसिन; सूखा/लवणता सहिष्णुता के लिए ZAT 12 TF, At DREB1 तथा mtLD; PBND और PSND प्रतिरोध के लिए PBNV और PSNV कोट प्रोटीन जीन; तथा स्पेडॉपटेरा की सहिष्णुता के लिए cry1Fa1, इत्यादि वंशाणुओं के प्रयोग से मूँगफली के ट्रांसफोर्मेशन का कार्य पूरे जोर से चल रहा है।

  • लवणता-सहिष्णुता वाली वनीय Arachis प्रविष्टियों से लवणता-दबाव-उत्पन्न ट्रांस्क्रिप्ट की पहचान  DDRT विश्लेषण द्वारा की गई है।

  • NPK उर्वरकों की अनुकूलतम आवश्यकताओं को निर्धारित किया गया है तथा  खरपरतवार नियंत्रण, और सिंचाई/वर्षा जल के कुशल-उपयोग की विधियां विकसित की गई हैं।

  • विभिन्न कृषि पारिस्थितिकी क्षेत्रों में विविध सूक्ष्मपोषकों की खुराक तथा उनके अनुप्रयोग की रीति पर कार्य चल रहा है।

  • राइजोबियम के दो कुशल उपभेदों 'ICR 6' और 'ICR 40' की पहचान की गई है।

  • उपज बढ़ाने में सक्षम लाभकारी सूक्ष्मजीवी समूहों को तैयार किया गया है।

  • मूँगफली-आधारित अंतःफसल प्रणालियों की पहचान की गई है।

  • विभिन्न कृषि-पारिस्थितिकी क्षेत्रों के लिए, व्याधियों और कीटों के प्रबंध के लिए आईपीएम मॉड्यूल विकसित किया गया है।

  • 'एस.एल.ऐ.' को पानी की उपयोग-क्षमता के साथ जुडा हुआ एक महत्वपूर्ण आकारिकी-विशेषक के रूप में पहचाना गया × मूल-स्थापना और सूखा-सहिष्णुता के बीच के संबंध को समझ लिया गया है।

  • मिट्टी और सिंचाई-पानी की लवणता के प्रबंधन पर प्रारंभिक काम पूरा हो चुका है।

  • मूँगफली के छिलके और तैलीय-अथवा तैलरहित-खली से औधोगिक महत्व के किण्वक-उत्पादन प्रौद्योगिकी को विकसित किया गया है।

  • भारत में मूंगफली उत्पादकता में धीमी गति से सुधार के लिए नई मूँगफली की प्रजातियों के बीज की अल्प-उपलब्धता को एक मुख्य कारक के रूप में पहचाना गया है।

  • कुटीर-उद्योग स्तर पर उत्पादन किये जा सकने वाले कई मूल्य-संवर्धित उत्पादों की पहचान की गई है।

प्रजनक बीज उत्पादन  एवं अंतर्राष्ट्रीय मान्यता  
प्रजनक बीज उत्पादन

     
भारत में मूंगफली के प्रजनक बीज के उत्पादन का समन्वयन भी AICRPG के द्वारा ही होता है। हर वर्ष प्रजनक बीज का उत्पादन राष्ट्रीय आवश्यकता से कहीं अधिक मात्रा में होता है।
अंतर्राष्ट्रीय
मान्यता
     
आंधप्रदेश के पातनचेरू में स्थित अंतर्राष्ट्रीय संस्थान ICRISAT ने, 1 दिसम्बर, 2009 को DGR को मूँगफली फसल अनुसंधान के क्षेत्र में 'उत्कृष्ट भागीदारी पुरस्कार' प्रदान किया। अपने अस्तित्व के 32 वर्ष पूरे करने के बाद अब भी डीजीआर भारत में मूँगफली के किसानों के कल्याण के लिए आने वाले वर्षों में अधिक बेहतर प्रौद्योगिकियों को देने के लिए प्रतिबद्ध है।
 

संकलन एवं संपादन: डॉ. जितेन्द्र भूषण मिश्र

अनुवाद एवं टंकण सहायता: श्री मुकेश जे. सोलंकी
 

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें

निदेशक: मूँगफली अनुसंधान निदेशालय, ईवनगर रोड, जूनागढ़-362 001, गुजरात, भारत

फोन: 0285 2673041, 2672461, Fax: +91 0285 2672550

URL: http://www.nrcg.res.in

 
©National Research Centre for Groundnut, PB No.5, Junagadh 362001, Gujarat, India Contact webmaster Updated on:27 September, 2011